विश्व की प्राचीन एवं समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। हजारों वर्षों से भारत ने दर्शन, साहित्य, व्याकरण, गणित, खगोल, आयुर्वेद, योग, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला और अध्यात्म सहित अनेक क्षेत्रों में विश्व को महत्वपूर्ण ज्ञान प्रदान किया है। इस विशाल ज्ञान-परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखने और आगे बढ़ाने में संस्कृत भाषा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। संस्कृत में केवल धार्मिक साहित्य ही उपलब्ध नहीं है, बल्कि मानव जीवन के लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण क्षेत्र से संबंधित विपुल साहित्य विद्यमान है। वेद, उपनिषद्, रामायण, महाभारत, भगवद्गीता, पुराण, दर्शन, काव्य, नाटक, व्याकरण,
आयुर्वेद, गणित और खगोलशास्त्र जैसे अनेक विषयों पर संस्कृत में महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना हुई।
अतः संस्कृत का संरक्षण केवल एक भाषा का संरक्षण नहीं है। यह भारत की बौद्धिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत के
संरक्षण से जुड़ा विषय है।
आज आवश्यकता है कि संस्कृत को केवल अतीत की भाषा मानने के बजाय आधुनिक भारत की आवश्यकताओं से जोड़ा
जाए। संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों के साथ-साथ डिजिटल तकनीक, सोशल मीडिया, कृत्रिम
बुद्धिमत्ता, शोध, रोजगार और जनजीवन में भी संस्कृत की उपयोगिता बढ़ाई जाए।
2. संस्कृत का महत्व और भारतीय संस्कृति में स्थान
संस्कृत शब्द का सामान्य अर्थ है- परिष्कृत, संस्कारित और व्यवस्थित । संस्कृत की व्याकरणिक संरचना अत्यंत
व्यवस्थित है। महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी भाषा-विज्ञान के इतिहास की महत्वपूर्ण कृतियों में मानी जाती है। कात्यायन
और पतंजलि ने भी व्याकरण की इस महान परंपरा को आगे बढ़ाया।
संस्कृत में विचारों को सूक्ष्मता, स्पष्टता और व्यवस्थित रूप से व्यक्त करने की क्षमता दिखाई देती है। यही कारण है कि आरतीय दर्शन, न्याय, मीमांसा, वेदांत, व्याकरण और साहित्य जैसे क्षेत्रों में इसका व्यापक प्रयोग हुआ।
भारतीय संस्कृति की अनेक मूल अवधारणाएँ संस्कृत से जुड़ी हुई हैं-धर्म, कर्म, योग, अहिंसा, सत्य, करुणा, सेवा, त्याग
और परोपकार आदि।
संस्कृत साहित्य में विश्वकल्याण की भावना भी प्रमुख रूप से दिखाई देती है-
सर्वे भवन्तु सुखिनः ।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
यह संदेश किसी एक वर्ग या समुदाय तक सीमित नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के कल्याण की कामना करता है।
हमारा मानना है कि संस्कृत को किसी अन्य भारतीय भाषा के विरोध में नहीं, बल्कि भारतीय भाषाई विविधता के बीच एक
महत्वपूर्ण ज्ञान-सेतु के रूप में देखना चाहिए।
3 संस्कृत और भारत की ज्ञान-परंपरा
भारत में ज्ञान को सुरक्षित रखने की एक लंबी परंपरा रही है। गुरुकुलों और विभिन्न शिक्षण परंपराओं के माध्यम से भाषा के
साथ साथ दर्शन, तर्क, अनुशासन, समाज और जीवन-मूल्यों का अध्ययन किया जाता था।
