शेख आबिद रायपुर

रायपुर – भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है। जनसंख्या की यह स्थिति देश के सामने जहाँ विकास के नए अवसर प्रदान करती है, वहीं कई जटिल चुनौतियां भी पेश कर रही है। हालिया आंकड़ों के अनुसार, हालांकि भारत की जनसंख्या बढ़ रही है, लेकिन संतोषजनक बात यह है कि इसकी वृद्धि दर (Growth Rate) में निरंतर गिरावट दर्ज की जा रही है।
प्रमुख सांख्यिकीय रुझानः

  1. वृद्धि दर में गिरावटः वर्ष 2011-2021 के दशक में जनसंख्या वृद्धि दर 12.5% रहने का अनुमान था, जिसके 2021-2031 के दौरान घटकर 8.4% होने की संभावना है।
  2. प्रजनन दर (TFR): 2024 तक भारत की कुल प्रजनन दर घटकर 2.12 तक पहुंच गई है, जो प्रतिस्थापन स्तर’ (Replacement Level) के लगभग बराबर है।
  3. जनसंख्या का दबावः निम्न विकास दर के बावजूद, मध्य-2063 तक भारत की जनसंख्या 1.67 बिलियन के शिखर (Peak) तक पहुँचने का अनुमान है।
    क्षेत्रीय और जनसांख्यिकीय चुनौतियांः
    देश में जनसंख्या का वितरण असमान है, जिससे ‘उत्तर-दक्षिण जनसांख्यिकीय अंतर’ (North-South Demographic Divide) पैदा हो रहा है। दक्षिण भारत के राज्यों में प्रजनन दर काफी कम है, जबकि उत्तर के कुछ राज्यों में यह अभी भी उच्च बनी हुई है। इसके साथ ही, लिंग अनुपात में असंतुलन और तीव्र गति से बढ़ती युवा आबादी (2021 में लगभग 27% युवा) के लिए शिक्षा और रोजगार जुटाना एक बड़ी प्राथमिकता बन गई है।
    वृद्धि के कारण और परिणामः
    चिकित्सा सुविधाओं में सुधार के कारण मृत्यु दर में कमी आई है, जो जनसंख्या वृद्धि का एक मुख्य कारण है। हालांकि, ग्रामीण क्षेत्रों में अशिक्षा, गरीबी और कम उम्र में विवाह जैसी समस्याएं अब भी उच्च जन्म दर की चुनौती पेश कर रही हैं। इसके परिणामस्वरूप जमीन, पानी और खाद्यान्न जैसे प्राकृतिक संसाधनों पर अत्यधिक दबाव बढ़ रहा है और बुनियादी ढांचे (शिक्षा, स्वास्थ्य) पर बोझ बढ़ रहा है।
    निष्कर्ष और सरकारी प्रयासः
    भारत सरकार परिवार नियोजन और महिला सशक्तिकरण के माध्यम से जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए विभिन्न कार्यक्रम लागू कर रही है। शिक्षा के प्रसार और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के परिणामस्वरूप प्रजनन दर में सकारात्मक कमी देखी जा रही है, जो भविष्य में एक स्थिर जनसंख्या की ओर इशारा करती है।