फाइलेरिया रोग की सामान्य जानकारी

शेख आबिद

इस रोग के परजीवी एक प्रकार के कृमि होते हैं जिनका वैज्ञानिक नाम “वूचेरेरिया बैंकॉप्टी” एवं “बुजिया मलाई” है।
ये कृमि धागे सदृष्य होते हैं जो मनुष्य की लसिका ग्रंथियों एवं लसिका वाहिनियों को प्रभावित करते हैं।
क्यूलेक्स” नामक मादा मच्छर इस रोग के परजीवियों को प्रभावित शरीर से स्वस्थ्य शरीर में फैलाती है
संक्रमण के उपरांत प्रारंभिक तौर पर संक्रमित व्यक्ति को अन्य मच्छर जनित रोगों की तरह ही ठंड लगकर बुखार आता है एवं प्रभावित अंग में लालीमा व सूजन आती है जो सामान्य उपचार उपरांत तात्कालिक रूप से ठीक हो जाती है।
रोग की स्थापित अवस्था आने तक उपरोक्त लक्षण साल में 1.2 बार आते रहते हैं।
सामान्यतया परजीवी से संक्रमित होने के 4 से 5 वर्ष बाद पूर्ण एवं सही उपचार न मिलने की दशा में रोगी का रोग स्थाई अवस्था को प्राप्त होता है जिसमें प्रभावित अंग जैसे हाथ, पांव, स्तन अथवा अण्डकोषों में स्थाई सूजन आ जाती है जो लाईलाज होती है।
प्रारंभिक अवस्था में (स्थापित अवस्था के पूर्व तक) बाह्य रूप से लक्षणों के आधार पर रोग की पहचान कठिन होती है क्योंकि अन्य अनेक रोगों में भी इसी प्रकार के लक्षण होते है।
इस रोग की प्रारंभिक अवस्था में पहचान का मात्र एक उपाय है और वह है रक्त जांच।
रक्त जांच हेतु रक्त नमूना रात 10:00 से 02:00 बजे के मध्य लिया जाता है जिस समय इन कृमियों के लार्वा माईकोफाइलेरिया का धनत्व परिधीय रक्त में अधिक होता है।

फाइलेरिया रोग की पहचान :-
फाइलेरिया नियंत्रण हेतु एम.डी.ए. के द्वारा माइकोफाइलेरिया संक्रमण को रोकना तथा फाइलेरिया रोग से जनसमुदाय को संरक्षित करना। सामान्यतः फाइलेरिया रोग से ग्रसित ब्यक्ति की रात 10:00 बजे से 02:00 बजे के मध्य रक्तपट्टी बनाकर जांच की जाती है तथा धनात्मक आने पर 12 दिन तक 6 मि.ग्रा. प्रति कि.ग्रा. शारीरिक वजन के हिसाब से डी.ई.सी. दवा दी जाती है। सामूहिक दवा सेवन गतिविधि के दौरान दवा सेवन कराने वाले (Drug Administrator) द्वारा दी जाने वाली दवाई घर-घर जाकर DOT पद्धति के अनुसार अपने समक्ष खिलाया जाना है, दवा खाली पेट नहीं खिलाया जाना है एवं घर में छोड़ कर नहीं आना है।