छत्तीसगढ़ का कबीर चबूतरा देशभर के श्रद्धालुओं, कबीरपंथियों और पर्यटकों के लिए आस्था का प्रमुख केंद्र है। यह गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले में अमरकंटक के समीप स्थित एक ऐतिहासिक स्थल है। यह संत परंपरा और सामाजिक समरसता का जीवत संदेश देता है।
लोकमान्यताओं के अनुसार, इसी पावन स्थल पर संत कत्रीर दास और सिख धर्म के संस्थापक गुरु नानक देव की ऐतिहासिक भेंट हुई थी। कहा जाता है कि दोनों महान संतों ने यहां मानवता, धर्म, समानता और आध्यात्मिक चिंतन
कबीर वट
कबीर चबूतरा
पर विस्तृत संवाद किया।
इसी कारण कबीर चबूतरा को
सांप्रदायिक सौहार्द और भारतीय
संत परंपरा का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि संत कबीर ने यहां वर्षों तक साधना की थी। उन्होंने अपने प्रमुख शिष्य धर्मदास को आध्यात्मिक ज्ञान प्रदान किया था।
परिसर में लगभग 500 से 600 वर्ष पुरानी कबीर कुटी आज भी मौजूद है। वहां एक विशाल वटवृक्ष भी है जो श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बना हुआ है। कबीर चबूतरा का एक प्रमुख आकर्षण कबीर सरोवर है।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, प्रतिदिन सुबह 9 से 10 बजे के बीच सरोवर के जल पर दूध जैसी सफेद धुंध दिखाई देती है। श्रद्धालु इसे एक चमत्कारिक घटना के रूप में देखते हैं। यह क्षेत्र घने साल के जंगलों से घिरा है और
प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। यहां से सोननदी के उद्गम स्थल सोनमूड़ा तक लगभग 8.5 किलोमीटर का ट्रेकिंग मार्ग है। यह मार्ग पर्यटकों और प्रकृति प्रेमियों को विशेष रूप से आकर्षित करता है।
छत्तीसगढ़ में संत कबीर की शिक्षाओं का प्रभाव आज भी व्यापक रूप से दिखाई देता है। प्रदेश का कबीर पंथ उनकी समता, प्रेम, भाईचारे और मानवता के संदेश को निरंतर आगे बढ़ा रहा है। पर्यटन और सांस्कृतिक दृष्टि से कबीर चबूतरा अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह न केवल प्रदेश की अमूल्य धरोहर है, बल्कि भारतीय संत परंपरा का भी प्रतीक है। यह स्थल आध्यात्मिक विरासत का एक अनमोल प्रतीक भी माना जाता है
