प्रेमचंद जी की जयंती हर वर्ष पूरे देश में हर्ष एवं उल्लास के साथ मनाई जाती है। इस तरह किसी और रचनाकार की जयंती नहीं मनाई जाती। इसी से प्रेमचंद के महत्व को समझा सकता है, उनकी लोकप्रियता का अनुमान लगाया जा सकता है। हिंदी साहित्य जगत में उपन्यास सम्राट के रूप में विख्यात प्रेमचंद न केवल हिंदी साहित्य और न केवल भारतीय साहित्य के अनमोल रतन है, बल्कि विश्व साहित्य में भी उनकी प्रतिभा बेजोड़ है। प्रेमचंद का संपूर्ण लेखन एक कर्मठ, प्रमाणिक, साहसी और देशभक्त व्यक्ति का लेखन है। भारत, भारत का निर्धन, गरीब, दरिद्री, अज्ञानी, अशिक्षित, शोषित, पीड़ित और दलित वर्ग की पीड़ा को, दर्द को प्रेमचंद ने बहुत गहरे महसूस किया और उसे अपने कथा साहित्य में अत्यंत मार्मिक तथा यथार्थ रूप में अभिव्यक्त किया। प्रेमचंद आजीवन गुलामी, गैर बराबरी, सामंती शोषण, पूंजीवाद, अनिष्ट रूढ़ि, प्रथा एवं परंपराएँ आदि के विरुद्ध लड़ते रहे और लिखते रहे। सही अर्थो में प्रेमचंद कलम के सिपाही थे। उनकी कलम को सलाम।
वास्तव में प्रेमचंद भारतीयता के, हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक हैं। भारत की साझा-संस्कृति के गंगा-जमुनी तहज़ीब के प्रतीक हैं। प्रेमचंद का फलक बहुत बड़ा है। वास्तव में अनुभव-संसार जितना बड़ा होगा, साहित्य में उतनी ही विविधता होगी, उदारता होगी और ऐसा ही साहित्य लोकप्रिय होता है। प्रेमचंद के साहित्य में हर वर्ग का, हर जाति का प्रतिनिधित्व करने वाले पात्र मिल जाएँगे। प्रेमचंद ने जितने अधिकार से हिंदू धर्म, हिंदू संस्कृति और सभ्यता, रूढ़ि एवं परंपरा, रीति-रिवाज, रहन-रिवाज, खान-पान आदि पर लिखा है, उतने ही अधिकार से मुस्लिम समाज पर भी लिखा है। ‘ईदगाह’ कहानी और उसके हमीद को कौन भूल सकता है? आज हमारे देश को, हमारे समाज को वास्तव में सांप्रदायिक सद्भाव की बंधुभाव की बहुत ज़्यादा जरूरत है। आज भारत में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की समस्या ने बड़ा ही विकराल रूप धारण कर लिया है। आज हर चीज को सांप्रदायिक चश्मे से देखा जाने लगा है। साहित्य और साहित्यकार भी इससे अछूते नहीं रह पाए। यहाँ तक की भाषा का भी बंटवारा हो गया है। प्रेमचंद जी ने इन खतरों से हमें बहुत पहले ही आगाह कर दिया था। उनका मानना था कि ‘हिंदू-मुस्लिम दो कौमों की एकता में ही राष्ट्र की भलाई है। दोनों मिल-जुलकर ही प्रगति कर सकते हैं। डूबेंगे तो दोनों डूबेंगे।’ ‘कर्बला’ नाटक इस बात का प्रमाण है।
सन 1934 में ‘सांप्रदायिकता और संस्कृति’ शीर्षक निबंध में प्रेमचंद जी लिखते हैं, ‘सांप्रदायिकता सदैव संस्कृति की दुहाई दिया करती है। उसे अपने असली रूप में निकलने में शायद लज्जा आती है इसलिए वह – उस गधे की भाँति जो सिंह की खाल ओढ़ कर जंगल में जानवरों पर रौब जमाता फिरता है – सांप्रदायिकता की खाल ओढ़ कर आती है।’
आज हिंदी और उर्दू भाषा का भी बंटवारा हो गया है। उर्दू को मुसलमानों की भाषा समझा जाने लगा है। हद तो यह हो गई है कि उसे अब पाकिस्तान की भाषा समझा जाने लगा है और उसके साथ सौतेला व्यवहार किया जाने लगा है। भारत जैसे देश और समाज के लिए यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक है। प्रेमचंद जी ने बहुत पहले ही इस और इशारा कर दिया था। हम सभी देशभक्त एवं सुधि जनों को ऐसी घिनौनी साजिशों से सावधान रहने की, सामंती मानसिकता वाले लोगों के षड्यंत्र को असफल बनाने की आवश्यकता है। प्रेमचंद के किसी एक पत्र का हवाला देकर, जो उन्होंने अपने किसी साहित्यिक मित्र को लिखा था, प्रेमचंद को हिंदुत्ववादी सिद्ध करने की साजिश रची जा रही है। हम सबको मिलकर इस साजिश को नाकाम कर देश में सांप्रदायिक सद्भाव को बनाए रखने में अपना महत्वपूर्ण योगदान देना होगा। यही प्रेमचंद जी को हमारी ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
‘गोदान’ प्रेमचंद जी का सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय उपन्यास है। प्रेमचंद की मृत्यु से मात्र एक वर्ष पूर्व सन् 1935 में प्रकाशित यह उपन्यास उनके संपूर्ण जीवन का, व्यक्तित्व एवं कृतित्व का निचोड़ है। ‘गोदान’ प्रेमचंद जी की उपन्यास-कला का चरमोत्कर्ष है। यह उपन्यास भारतीय कृषक जीवन का महाकाव्य होने के साथ-साथ उनकी व्यथा की महागाथा भी है। ‘गोदान’ का मुख्य पात्र होरी देश के उन तमाम दीन-हीन, शोषित-पीडित, उपेक्षित-तिरस्कृत किसानों का प्रतिनिधित्व करता है, जो आसमानी और सुलतानी दोनों शक्तियों की मार सहते हैं। भारत भले ही कृषि-प्रधान राष्ट्र है, किसान भले ही सबके अन्नदाता हैं, लेकिन वह आज भी दरिद्रता एवं अभावों में ही अपना संपूर्ण जीवन काटने को विवश है।
‘गोदान’ के होरी का संपूर्ण जीवन दरिद्रता, अभावग्रस्तता और शोषण की करुण कहानी है। हमारी सारी व्यवस्था, शोषण तंत्र उसको निगल जाने के लिए मुँह बाए खड़े हैं, परंतु वह पर्वत की तरह सबकुछ सहकर भी अड़िग खड़ा रहता है। होरी का संपूर्ण जीवन एक वीर योद्घा का संघर्षपूर्ण जीवन है। पत्नी धनिया की फटकार, पुत्र गोबर का व्यंग्य, जमींदार की घुड़कियाँ, महाजनों की गालियाँ, पुलिस का अत्याचार सब कुछ सहन करता हुआ भी वह पीछे नहीं हटता और न जीवन-संघर्ष में मिटकर भी पराजय ही स्वीकार करता है। वह वर्तमान भारतीय किसान की तरह आत्महत्या नहीं करता, बल्कि मर कर भी अमर हो जाता है। शोषक व्यवस्था उसके प्राण ले लेती है, किंतु उसे पराजित नहीं कर पाती। प्रेमचंद लिखते हैं, “जीवन के सारे संकट, सारी निराशाएँ, मानो उसके चरणों पर लोट रही थी। कौन कहता, जीवन-संग्राम में वह हारा है। यह उल्हास, यह हर्ष, यह पुलक क्या हार के लक्षण हैं? इन्हीं हारों में उसकी विजय है। उसके टूटे-फूटे वस्त्र उसकी विजय पताकाएँ हैं।”
आज स्वतंत्र भारत में, लोकतंत्र में होरी की अवस्था अत्यंत दीन-हीन हो चुकी है और वह आत्महत्या करने पर मजबूर है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि 1995 से 2014 के बीच 296,438 किसानों ने आत्महत्या की थी, 2014 से 2022 के बीच नौ वर्षों में यह संख्या 100,474 थी। महाराष्ट्र सरकार ने विधान परिषद में जानकारी दी कि साल 2025 की पहली तिमाही (जनवरी से मार्च) में राज्य में 767 किसानों ने आत्महत्या की।
‘गोदान’ का यह महान संदेश है कि वर्तमान शोषक व्यवस्था का अंत होकर रहेगा और एक ऐसे नव-समाज की स्थापना होगी, जिसमें शोषक-शोषित का वर्ग भेद न रहेगा और सभी सुखी होंगे। यही प्रेमचंद के संपूर्ण साहित्य का सार और जीवन का अंतिम सपना था, जो आजादी के 78 वर्षों बाद भी पूर्ण होता नहीं दिखाई दे रहा है।
प्रेमचंद ने पूंजीवाद के खतरे से भी हमें आगाह किया था। प्रेमचंद ने रचनाकारों को पूंजीवादी, साम्राज्यवादी, सामंतवादी और सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध लड़ने के लिए रचनात्मक मार्गदर्शन किया। प्रेमचंद पूंजीवाद को राजशाही से भी ज़्यादा खतरनाक मानते थे। प्रेमचंद ने ‘महाजनी सभ्यता के सूर्यास्त’ का सपना देखा था, किंतु आज प्रेमचंद के देश में महाजनी सभ्यता का सूर्य बहुत तेज़ी से चमक रहा है। आज सत्ता अंबानी, अदानी जैसे महाजनों के आगे नतमस्तक है और साहित्यकार सत्ता के आगे। प्रेमचंद सदैव सत्ता के अन्याय के विरुद्ध खड़े रहे। नौकरी त्याग दी, भूमिगत रहना स्वीकार किया, भाषा बदल दी, नाम बदल दिया पर घुटने नहीं टेके। वर्तमान रचनाकारों को इस पर विचार करने की आवश्यकता है।
प्रेमचंद आज भी हमारे बीच अपनी रचनाओं के माध्यम से, अपने पात्रों के माध्यम से जीवित है और हमेशा रहेंगे। आज भी हमारे समाज में घीसू और माधव की कमी नहीं है, आज भी बुधिया दवा-दारु के अभाव में अपना प्राण तोड़ रही है, तो ‘पूस की रात’ में किसान आज भी ठंड से मरने को विवश है। ठाकुरों ने आज भी अपने कुओं पर पहरे लगा रखे हैं।
स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद भी हामिद नंगे पैर ‘ईदगाह’ जाने को मजबूर है। मीर सज्जाद अली और मीर रोशनअली को लखनऊ की चिंता नहीं, वे तो अब भी गोमती के किनारे शतरंज खेलने में मग्न हैं। ‘सद्गति’ के दुखी की लाश को आज भी कोई हाथ लगाने को तैयार नहीं। प्रेमचंद के अनुसार ‘पंच में परमेश्वर का निवास होता है’, किंतु आज न्याय व्यवस्था भी भ्रष्टाचार से पूर्णतः अलिप्त नहीं रही है।
धनपतराय नाम ने धन से दूर रखा, नवाबराय नाम ने छिप छिप कर रहने को विवश किया, पर प्रेमचंद नाम ने समस्त सर्वहारा एवं शोषित जनता के प्रेम का पात्र बना दिया। वे साहित्य को समाज का दर्पण मानकर उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता पर बहुत बल देते थे। प्रगतिशील लेखक संघ के सन 1936 को लखनऊ में संपन्न पहले अधिवेशन की उन्होंने अध्यक्षता की और इसी वर्ष यह महामानव अनेक सपने साथ लेकर इस दुनिया से सदा के लिए विदा हो गया।
डॉ. ज़हीरूद्दिन पठान
प्रोफेसर,
हिंदी विभाग,
कै. बाबासाहेब देशमुख गोरठेकर महाविद्यालय, उमरी। ज़ि. नांदेड।
