यौम-ए-आज़ादी हर क़ौम की तारीख़ में एक अहम मुक़ाम रखता है। यह वह दिन होता है जब कोई क़ौम गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़कर आज़ादी की नेमत हासिल करती है। भारत के लिए 15 अगस्त का दिन इसी अहमियत का हामिल है। यह दिन हमें अपने बुजुर्गों की कुर्बानियों की याद दिलाता है और साथ ही यह एहसास भी कराता है कि आज़ादी के बाद हमारी ज़िम्मेदारियाँ क्या हैं, ख़ास तौर पर मुसलमान होने के नाते हम पर कौन-से फ़र्ज़ आयद होते हैं।
भारत के मुसलमानों ने आज़ादी की जद्दोजहद में अहम किरदार अदा किया और बेशुमार कुर्बानियाँ पेश कीं। लेकिन आज़ादी हासिल करने के बाद असली इम्तिहान शुरू होता है, क्योंकि आज़ादी के साथ ज़िम्मेदारियाँ भी जुड़ी होती हैं। कुरआन मजीद में अल्लाह ताला फरमाता है: इन्नल्लाह यअमुरु बिल-अलि वल-इहसान’ (सूरह नहल: 90), यानी अल्लाह तुम्हें इंसाफ़ और भलाई का हुक्म देता है। यह आयत हमें यह सिखाती है कि एक मुसलमान की बुनियादी ज़िम्मेदारी इंसाफ़ और नेक कामों को बढ़ावा देना है, चाहे वह किसी भी समाज में रहता हो।
एक मुसलमान की हैसियत से सबसे पहली ज़िम्मेदारी यह है कि वह अपने देश के संविधान और क़ानूनों की पाबंदी करे। नबी करीम ने फ़रमायाः “अल-मुस्लिमून अला शुरूतिहिम’ (सुनन अबू दाऊद), यानी मुसलमान अपने किए हुए वादों और समझौतों के पाबंद होते हैं। इस हदीस की रौशनी में यह बात साफ़ होती है कि जिस मुल्क में हम रहते हैं, उसके क़ानूनों और उसूलों का एहतराम करना हमारी दीनदाराना ज़िम्मेदारी है।
यौम-ए-आज़ादी हमें इत्तेहाद और यकजहती का पैग़ाम देता है। कुरान में अल्लाह ताला फ़रमाता है:
वअतसिमू बिहबलिल्लाहि जमीअन वला तफ़र्रकू” (सूरह आले-इमरानः 103), यानी सब मिलकर अल्लाह की रस्सी को मज़बूती से थाम लो और आपस में फूट न डालो। मुसलमानों को चाहिए कि वे न सिर्फ़ आपस में एकता बनाए रखें बल्कि दूसरी बिरादरियों के साथ भी भाईचारा और मेलजोल को बढ़ावा दें।
इस्लाम अमन, मोहब्बत और बर्दाश्त का मज़हब है। नबी करीम ने फ़रमायाः अल-मुस्लिम मन सलिमल मुस्लिमून मिन लिसानिही व यदिही’ (सहीह बुखारी), यानी मुसलमान वह है जिसकी जुबान और हाथ से दूसरे लोग महफूज़ रहें। इस हदीस से यह समझ में आता है कि एक अच्छा मुसलमान वही है जो समाज में अमन और सुकून का ज़रिया बने।
तालीम की अहमियत पर भी कुरआन और हदीस में बहुत ज़ोर दिया गया है। कुरान की पहली वही ही “इक़रा” (पढ़ो) के हुक्म से शुरू होती है। नबी करीम ने फ़रमायाः “तलबुल
इल्म फ़रीज़तुन अला कुल्लि मुस्लिम’ (सुनन इन्न माजा), यानी इल्म हासिल करना हर मुसलमान पर फ़र्ज़ है। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि वे दीन और दुनियावी दोनों तरह की तालीम हासिल करें, ताकि वे अपने फ़र्ज़ बेहतर तरीके से निभा सकें और देश की तरक़्क़ी में हिस्सा ले सकें।
सामाजिक ज़िम्मेदारियों के सिलसिले में कुरान में फ़रमाया गया है: “वता आवनू अलल बिर्रि वत्तक़वा’ (सूरह माइदाः 2), यानी नेकी और परहेज़गारी के कामों में एक-दूसरे की मदद करो। इस आयत की रौशनी में मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने समाज की बेहतरी के लिए काम करें, गरीबों और ज़रूरतमंदों की मदद करें और इंसाफ़ के क़ायम होने के लिए कोशिश करें।
सियासी शऊर भी एक अहम ज़िम्मेदारी है। इस्लाम हमें मशविरा और सामूहिक फ़ैसले लेने की तालीम देता है। कुरान में फ़रमाया गया है: “वअमुहम शूरा बैनहुम’ (सूरह शूराः 38), यानी उनके मामले आपसी मशविरे से तय होते हैं। इस उसूल की रौशनी में मुसलमानों को चाहिए कि वे जम्हूरी अमल में हिस्सा लें, अपने वोट का सही इस्तेमाल करें और ऐसे नुमाइंदों को चुनें जो ईमानदारी और इंसाफ़ के साथ काम करें।
यौम-ए-आज़ादी का तक़ाज़ा है कि हम अपने माज़ी की कुर्बानियों को याद रखते हुए अपने हाल को बेहतर बनाएं और मुस्तक़बिल के लिए अच्छी तैयारी करें। मुसलमानों को चाहिए कि वे अपने दीन की तालीमात पर अमल करते हुए एक अच्छे नागरिक बनें, देश की तरक़्क़ी में हिस्सा लें और अमन-ओ-अमान को क़ायम रखने में अपना किरदार अदा करें।
आख़िर में यह कहा जा सकता है कि आज़ादी एक बहुत बड़ी नेमत है, और इसकी हिफ़ाज़त करना हम सब की ज़िम्मेदारी है। अगर मुसलमान कुरान और सुन्नत की तालीमात पर अमल करते हुए अपनी सामाजिक और क़ौमी ज़िम्मेदारियाँ निभाएँ, तो वे न सिर्फ़ खुद तरक़्क़ी करेंगे बल्कि पूरे देश की खुशहाली और स्थिरता में भी अहम योगदान देंगे। यही यौम-ए-आज़ादी का असल पैग़ाम है और यही हमारी कामयाबी का रास्ता है।
