दुर्ग, छत्तीसगढ़
यह केवल भूमि विवाद नहीं है, बल्कि लगभग 17 वर्षों (2009-2026) से चले आ रहे ऐसे मामले का विषय है, जिसमें आरोप है कि पहले कथित रूप से गलत दस्तावेजों के आधार पर कॉलोनाइज़र लाइसेंस प्राप्त किया गया, फिर साझेदारी फर्म की करोड़ों रुपये मूल्य की भूमि को व्यक्तिगत भूमि मानकर राजस्व अभिलेखों में कथित रूप से अवैध खाता विभाजन किया गया, उसके बाद उसी भूमि के टुकड़े कर बिक्री की गई। इस पूरे घटनाक्रम के संबंध में वर्तमान में विभागीय जांच, राजस्व विवाद, सिविल वाद तथा पुलिस एफआईआर तक की कार्रवाई हो चुकी है।
- मामला कहाँ से शुरू हुआ?
वर्ष 2009 में “श्री ऋद्धि सिद्धि बिल्डर्स” नामक साझेदारी फर्म का गठन किया गया। सभी साझेदारों ने अपनी-अपनी पूंजी एवं भूमि फर्म में लगाई। फर्म के नाम से भूमि खरीदी गई तथा राजस्व अभिलेखों में भी भूमि फर्म के नाम दर्ज रही। फर्म का कभी विधिवत विघटन नहीं हुआ। - कथित फर्जी कॉलोनाइज़र लाइसेंस
हमारा आरोप है कि फर्म के गठन के समय स्वयं को फर्म का प्रोपराइटर बताकर नगर पालिक निगम दुर्ग से कॉलोनाइज़र लाइसेंस प्राप्त किया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि बैंक गारंटी दस्तावेजों में काट-छांट कर उनका उपयोग किया गया। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर कॉलोनाइज़र लाइसेंस जारी हुआ।
उसी लाइसेंस को दिखाकर लोगों से फ्लैट बुकिंग कराई गई, निवेश लिया गया तथा निवेशकों को 12% ब्याज का आश्वासन दिया गया। शिकायत के अनुसार वर्ष 2018 के बाद न तो फ्लैट दिए गए और न ही ब्याज एवं मूलधन लौटाया गया। - फर्म की भूमि हमेशा फर्म की संपत्ति रही
फर्म की भूमि का उपयोग कॉलोनी विकास के लिए किया गया। फर्म के लेखा अभिलेखों में वही भूमि फर्म की संपत्ति दिखाई गई, उसकी बिक्री दर्ज की गई तथा उससे प्राप्त लाभ पर आयकर भी जमा किया गया।
यही तथ्य आगे पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण आधार बनता है। - वर्ष 2018 में क्या हुआ?
वर्ष 2018 में कथित रूप से फर्म की भूमि को इस प्रकार खाता विभाजन कर दिया गया मानो वह व्यक्तिगत संयुक्त खातेदारों
वर्ष 2018 में कथित रूप से फर्म की भूमि को इस प्रकार खाता विभाजन कर दिया गया मानो वह व्यक्तिगत संयुक्त खातेदारों
की भूमि हो।
जबकि बाद के राजस्व आदेशों में भी यह कहा गया कि फर्म का विघटन नहीं हुआ था तथा फर्म की भूमि का इस प्रकार खाता विभाजन नहीं किया जा सकता। - सबसे बड़ा विरोधाभास
पूरा विवाद केवल खाता विभाजन का नहीं है।
सबसे बड़ा प्रश्न यह है-
यदि भूमि व्यक्तिगत थी, तो-
फर्म की संपत्ति क्यों दिखाई गई?
बिक्री फर्म के खातों में क्यों दर्ज हुई?
लाभ पर आयकर क्यों जमा किया गया?
और यदि भूमि वास्तव में फर्म की थी, तो उसे व्यक्तिगत भूमि मानकर खाता विभाजन किस कानून के तहत किया गया?
यही इस पूरे प्रकरण का मूल प्रश्न है। - सरकारी जांचों में क्या सामने आया?
जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए-
जिन दस्तावेजों का उल्लेख खाता विभाजन रजिस्टर में किया गया था, वे उपलब्ध नहीं कराए जा सके।
तत्कालीन तहसीलदार और संबंधित पटवारी के लिखित उत्तर एक-दूसरे के विपरीत पाए गए।
अपर कलेक्टर के आदेश में उल्लेख किया गया कि बिना प्रकरण दर्ज किए, बिना इश्तहार, बिना फर्द बंटवारा तथा बिना संबंधित पक्ष की उपस्थिति के कार्यवाही की गई।
SDM जांच रिपोर्ट में भू-राजस्व संहिता की धारा 178 एवं 178 (क) के पालन में कमी का उल्लेख किया गया।
आयुक्त द्वारा जारी विभागीय आरोप-पत्र में भी संबंधित अधिकारियों की कार्यवाही पर प्रश्न उठाए गए। - वर्ष 2024 में क्या पता चला?
जब राजस्व अभिलेखों का परीक्षण किया गया, तब शिकायतकर्ता को जानकारी मिली कि कथित खाता विभाजन के बाद फर्म
की भूमि को छोटे-छोटे हिस्सों में विभाजित कर विभिन्न विक्रय पत्र निष्पादित किए गए।
इसी आधार पर रजिस्ट्री निरस्तीकरण, घोषणा, बंटवारा, कब्जा एवं स्थायी निषेधाज्ञा के लिए प्रधान जिला न्यायालय, दुर्ग में दीवानी वाद दायर किया गया। - वर्तमान स्थिति
आज इस मामले में-
विभागीय जांच हो चुकी है।
राजस्व अपीलें लंबित/प्रक्रियाधीन रही हैं।
सिविल न्यायालय में वाद दायर है।
न्यायालय के आदेश के बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 420 एवं 34 के अंतर्गत एफआईआर दर्ज कर विवेचना प्रारंभ कर दी है। - हमारी मांग
हम किसी व्यक्ति विशेष के विरुद्ध व्यक्तिगत अभियान नहीं चला रहे हैं।
हमारी केवल निम्नलिखित मांगें हैं-
